Friday, April 3, 2009

लोकतंत्र के हित में

संजय दत्त को लोकसभा का चुनाव लड़ने से रोकने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने भले ही मुन्ना भाई, उनकी पार्टी और उनके प्रशंसकों को निराश किया हो, किंतु इस फैसले का सकारात्मक पक्ष यह है कि अब उन अनेक अपराधिक इतिहास वाले बाहुबलियों का मनोबल टूटेगा जो चुनाव लड़ने के लिए अपनी सजा का निलंबन कराने के लिए अदालत जाने वाले थे राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने की दिशा में इस अदालती पहल की सराहना की जानी चाहिए हालाँकि, यह इनमें दिया जा रहा है कि संजय दत्त को पेशेवर अपराधी की श्रेणी में नही रखा जा सकता मुंबई की टाडा अदालत और अब शीर्ष अदालत ने भी यह माना है मुमकिन है कि संजय दत्त निर्दोष हों हो सकता है कि मुंबई बम-कांड या उसे अंजाम देने वालों के साथ उनके वैसे रिश्ते ना हों किंतु, 1993 में हुए मुंबई बम-कांड जैसे राष्ट्र-विरोधी मामले में जाने-अनजाने उनकी संलिप्तता को अनदेखा नही किया जा सकता, जिसमें करीब 250 लोग मारे गए थे उस मामले में विशेष टाडा अदालत ने संजय दत्त को आर्म्स एक्ट के तहत 6 वर्ष की सजा मुक़र्रर की थी ऊपरी अदालत द्वारा जब तक इसका निपटारा नही हो जाता, संजय दत्त एक सजा-याफ्ता व्यक्ति हैं चूँकि भारतीय जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (3) के तहत दो साल या इससे अधिक की सजा पाने वाला व्यक्ति चुनाव नही लड़ सकता अतः शीर्ष अदालत का यह फ़ैसला न्याय-संगत ही है

सुप्रीम कोर्ट का संजय दत्त को चुनाव लड़ने की इजाजत ना देने का फ़ैसला इस नजरिये से भी स्वागत योग्य है कि देश भर में फैले केंद्रीय कारागार में ना जाने कितने ऐसे सजा-याफ्ता बंदी हैं या जमानत पर छूटे हुए पेशेवर हैं जो सामाजिक स्वीकृति और संसदीय विशेषाधिकारों को हासिल करने के लिए चुनाव लड़ने को तैयार बैठे हैं अगर संजय दत्त को अनुमति मिल जाती तो यह एक ग़लत परम्परा की शुरुआत होती, जिसकी सीढियाँ चढ़कर इनमें से कई संसद या विधान-सभाओं में पहुँचने का जुगाड़ ढूंढ़ ही लेते

हाल के कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में अपराधियों का दखल लगातार बढ़ता ही जा रहा है यह लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए शुभ संकेत नही है राजनीति के अपराधीकरण के इस मुद्दे पर किसी भी दल ने ध्यान देने की जरुरत नही समझी इस पर राजनीतिक दलों से तो कोई उम्मीद नही की जा सकती ऐसे विकट समय में जबकि न्यायपालिका का यह कदम समयानुकूल एवं प्रशंसनीय है, बाकी काम मतदान के समय जनता को ही करना है


Saturday, March 28, 2009

माया महा ठगिनी...

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर अब तक लोकसभा चुनाव पर होने वाले सरकारी खर्च में बेतहाशा वृद्धि हुई हैसन1952 में हुए प्रथम लोकसभा के चुनाव में करीब दस करोड़ पैंतालिस लाख रूपये खर्च हुए थेजबकि 2004 में चुनाव में लगभग तेरह अरब रूपये खर्च हुए थेसेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के आंकडों के मुताबिक पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियाँ लगभग साढे तेतालीस अरब रूपये खर्च करेंगीइसके अलावा क्षेत्रीय पार्टियाँ भी करीब दस अरब रूपये खर्च करने वाली हैंइस चुनावी मौसम में अपने फायदे के लिए कई नेताओं ने डाक्यूमेंट्री-विज्ञापन फिल्में बनवाई हैंलालकृष्ण आडवाणी, मायावती, मुरली मनोहर जोशी, केसरीनाथ त्रिपाठी के अलावा और भी नेताओं ने अपने ऊपर फिल्में बनवाने के लिए विज्ञापन एजेंसियों और फिल्मकारों की सेवाएं ली हैंइन्हें बनवाने के लिए नेताओं ने कुछ लाख से लेकर करोड़ तक खर्च किए हैंकांग्रेस पार्टी ने चुनावी प्रचार के लिए अपना बजट लगभग 150 करोड़ रूपये निर्धारित किया हैवहीं भारतीय जनता पार्टी ने इस मद में लगभग 250 करोड़ रूपये खर्च करने की तैयारी कर ली हैसिटी ग्रुप ग्लोबल मार्केट की रिपोर्ट के अनुसार, इस चुनाव में विज्ञापनों पर कम से कम 800 करोड़ रूपये खर्च होंगेसेण्टर फॉर मीडिया स्टडीज के मुताबिक, अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर 8000 करोड़ रूपये खर्च हुएखास बात यह है कि जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर 8000 करोड़ रूपये की रकम लगभग एक साल में खर्च की गई, वहीं भारतीय लोकसभा चुनाव पर करीब 10,000 करोड़ रूपये चंद महीनों में ही खर्च हो जायेंगेविज्ञापनों के अलावा मतदाताओं के बीच भी एक बड़ी रकम लुटाई जानी हैइसे उचित ठहराते हुए नेताओं का मानना है कि चर्चा, पर्चा और खर्चा तो चुनाव में होना ही चाहिएसोचने वाली बात तो यह है कि इतना पैसा आएगा कहाँ से!

ग्रह मंत्रालय के अफसरों के अनुसार फॉरेन कंट्रीब्युशन रेग्युलेशन एक्ट (FCRA) के तहत पिछले चुनाव में करीब 6 हजार 256 करोड़ रूपये विदेश से आए थे, जबकि ताजा आंकडों के मुताबिक अब तक 14 हजार 926 अरब रूपये FCRA की जानकारी में आए हैंभारत में अमेरिका के राजदूत रहे डेनियल पैट्रिक ने अपनी किताब में लिखा कि केरल और पश्चिम बंगाल में सत्ता समीकरण बदलने के लिए उन्होंने श्रीमती गाँधी को पैसे दिए थेकांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने अपनी डायरी में लिखा कि श्रीमती गाँधी सोवियत संघ से पैसा लिया करतीं थीं2007 में क्रिस्टोफर आंद्रे ने अपनी पुस्तक "मित्रोखिन आर्काइव-टु" में ऐसे ही 375 लोगों के नाम प्रकाशित किए जिनके नाम सोवियत संघ से पैसा आता थाउन्होंने पूर्व प्रतिरक्षा मंत्री कृष्ण मेनन का नाम भी लिया। "मितोखिन आर्काइव-टु" में और भी कई सनसनी-खेज खुलासे किए गएइसके अलावा सीआईए-मोसाद से आर्थिक मदद लेने के आरोप भाजपा पर भी लगेरेमण्ड बेकर की पुस्तक "कैपिट्लिस्म अकिलीज हील" में भी खुलासा किया गया है कि पश्चिम से 5 लाख करोड़ डॉलर गरीब देशों में षडयंत्र करने और मर्जी की सरकार बनवाने के लिए भेजे गए

बम-बन्दूक, दारू-शराब और दौलत के बिना चुनाव सम्भव क्यों नही है? क्या इस सब के बाद विदेशी ताकतें अपना हित साधने के लिए भारतीय राजनीति में घुसपैठ नही करेंगी? क्या इससे भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति प्रभावित नही होगी? इस सब को रोकना ही होगा, अन्यथा भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए एक गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा